2027 में भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन, चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच कनेक्टिविटी पर होगी नजर

नई दिल्ली

चाबहार और उत्तर-दक्षिण गलियारे की चुनौतियों के बीच भारत की रणनीतिक पहल; व्यापार और निवेश बढ़ाने पर जोर

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले वर्ष भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा की है। वर्ष 2022 के बाद प्रस्तावित यह सम्मेलन ऐसे समय में होने जा रहा है, जब भारत मध्य एशियाई देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को नई गति देने की कोशिश कर रहा है। साथ ही भारत और यूरेशियन आर्थिक संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर भी प्रगति हुई है।

कनेक्टिविटी बनी सबसे बड़ी चुनौती

मध्य एशिया भारत के लिए ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और नए बाजारों की दृष्टि से अहम है। कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिशों के बावजूद सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक कनेक्टिविटी की है।

भारत की इन देशों के साथ सीधी भूमि सीमा नहीं है। पाकिस्तान के रास्ते जमीनी संपर्क व्यावहारिक रूप से उपलब्ध नहीं होने के कारण भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे जैसे विकल्पों पर निर्भर है।

चाबहार परियोजना पर संघर्ष का असर

ईरान में जारी संघर्ष और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चाबहार के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच की योजनाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार, भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए स्थायी समाधान तलाशने को प्रमुख हितधारकों के साथ बातचीत कर रहा है।

वहीं, रूस, ईरान और मध्य एशिया को जोड़ने वाला अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा भी मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच धीमी गति से आगे बढ़ रहा है।

व्यापार बढ़ा, लेकिन चीन से काफी पीछे

कनेक्टिविटी की चुनौतियों के बावजूद भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच व्यापार में वृद्धि हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2025 में दोनों के बीच व्यापार करीब 2 अरब डॉलर से कम रहा, जो पिछले 15 वर्षों में लगभग 3.5 गुना बढ़ा है।

भारत मध्य एशिया से तेल, उर्वरक, कच्चा रेशम और तांबे की ट्यूब जैसे उत्पाद आयात करता है, जबकि दवाएं, विनिर्मित वस्तुएं और कृषि उत्पाद निर्यात करता है।

इसके मुकाबले मध्य एशिया में चीन का व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक बताया गया है। चीन इस क्षेत्र में ऊर्जा, विनिर्माण, हरित ऊर्जा और कृषि तकनीक समेत कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है।

भारत के लिए वैकल्पिक साझेदार बनने का अवसर

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत चीन के निवेश और व्यापार के स्तर की सीधी बराबरी भले न कर सके, लेकिन वह मध्य एशियाई देशों के लिए एक वैकल्पिक साझेदार के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है।

उज्बेकिस्तान ने हाल में भारतीय नागरिकों के लिए 30 दिनों की वीजा-मुक्त व्यवस्था की घोषणा की है। दोनों देशों ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के साथ दुर्लभ खनिजों और भारत को यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति जैसे मुद्दों पर भी चर्चा की है।

डिजिटल, AI और स्वास्थ्य में सहयोग की संभावनाएं

यूरेशिया और पश्चिम एशिया विशेषज्ञ मीना सिंह रॉय के अनुसार, मध्य एशियाई देश भारत से सहयोग की गति और बढ़ाने की अपेक्षा रखते हैं। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बैंकिंग, खेल, पर्यटन, खाद्य सुरक्षा, वस्त्र, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं हैं।

उनके मुताबिक भारत और मध्य एशिया के मजबूत राजनीतिक एवं रणनीतिक रिश्तों में आर्थिक संबंध अभी कमजोर कड़ी बने हुए हैं। ऐसे में भारत के लिए लगातार उच्चस्तरीय संवाद बनाए रखना और व्यापारिक संपर्क बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।

2027 के बाद भी जारी रखना होगा संवाद

मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए भारत को केवल एक शिखर सम्मेलन तक सीमित रहने के बजाय नियमित संवाद और परियोजनाओं पर जोर देना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि कनेक्टिविटी, निवेश और व्यापार के मोर्चे पर लगातार प्रयास ही भारत की रणनीतिक रुचि को वास्तविक प्रभाव में बदल सकते हैं।

शिखर सम्मेलन की घोषणा से भारत ने मध्य एशिया के साथ रिश्तों को प्राथमिकता देने का संकेत दिया है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत कनेक्टिविटी की बाधाओं के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को कितनी तेजी से आगे बढ़ा पाता है।

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