सड़क नहीं मिली तो ग्रामीणों ने खुद थामे औजार, सकंड में श्रमदान से शुरू किया सड़क निर्माण

उत्तराखण्ड राज्य समाचार

नौ किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर ग्रामीण, बोले—अब भी नहीं बनी सड़क तो 2027 में करेंगे चुनाव बहिष्कार

चमोली। कर्णप्रयाग विकासखंड के सकंड गांव में सड़क सुविधा का इंतजार कर रहे ग्रामीणों का सब्र आखिरकार जवाब दे गया। वर्षों से शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सड़क की मांग करने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई न होने पर ग्रामीणों ने अब खुद ही सड़क निर्माण की कमान संभाल ली है। ग्राम प्रधान शिवानी चौधरी के नेतृत्व में ग्रामीण अपने निजी संसाधनों और श्रमदान से सड़क काटने में जुट गए हैं।

ग्रामीणों ने गेती, फावड़ा, बेलचा समेत अन्य औजार उठाकर गांव तक सड़क पहुंचाने का काम शुरू किया है। उनका कहना है कि लंबे समय से सड़क के लिए अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई जा रही है, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला। मजबूर होकर अब ग्रामीणों ने अपने स्तर पर रास्ता तैयार करने का फैसला किया है।

बीमार और बुजुर्गों की सबसे ज्यादा परेशानी

सड़क सुविधा नहीं होने से सकंड गांव के लोगों को करीब नौ किलोमीटर की पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। सबसे अधिक दिक्कत बीमार, बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को होती है। किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ने पर उसे पैदल सड़क तक पहुंचाना पड़ता है, जिसके बाद वाहन से अस्पताल ले जाना संभव हो पाता है।

ग्रामीणों के मुताबिक सड़क के अभाव का असर सिर्फ आवागमन पर नहीं, बल्कि खेती-किसानी पर भी पड़ रहा है। कृषि उपज को बाजार तक पहुंचाने, जरूरी सामान गांव तक लाने और आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

कई बार सर्वे, फिर भी नहीं शुरू हुआ काम

ग्रामीणों का कहना है कि गांव को सड़क से जोड़ने के लिए कई बार सर्वे कराए गए, लेकिन इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका। सड़क की मांग को लेकर ग्रामीणों ने 5 और 6 जनवरी को आंदोलन भी किया था। उस दौरान विधायक अनिल नौटियाल के आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त किया गया।

ग्रामीणों के अनुसार विधायक ने तीन माह के भीतर सड़क का सर्वे कराने और जल्द सड़क कटिंग शुरू कराने का भरोसा दिया था। निर्धारित समय बीतने के बाद भी काम शुरू नहीं होने पर ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ गई।

‘सरकार को आइना दिखाने के लिए उठाया कदम’

ग्रामीणों का कहना है कि अपने सीमित संसाधनों से सड़क निर्माण शुरू करना उनकी मजबूरी भी है और शासन-प्रशासन को आइना दिखाने का प्रयास भी। उनका कहना है कि जब ग्रामीण खुद सड़क बनाने के लिए श्रमदान कर सकते हैं, तो संबंधित विभागों को भी उनकी समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए।

ग्रामीणों ने मांग की है कि सकंड गांव को सड़क से जोड़ने के लिए जल्द सरकारी स्तर पर स्वीकृति दी जाए और स्थायी सड़क निर्माण शुरू कराया जाए।

वन भूमि को लेकर प्रशासन ने जताई आपत्ति

उपजिलाधिकारी कर्णप्रयाग अल्केश नौटियाल ने बताया कि ग्रामीणों द्वारा अपने संसाधनों से सड़क निर्माण किए जाने का मामला संज्ञान में आया है। उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर ग्रामीण सड़क बना रहे हैं, वह वन भूमि के अंतर्गत आता है। मामले की जानकारी संबंधित विभागों को भी दी जा रही है।

सड़क नहीं तो चुनाव बहिष्कार की चेतावनी

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सकंड गांव को सड़क सुविधा से नहीं जोड़ा गया तो वे 2027 के विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करेंगे। ग्रामीणों ने कहा कि चुनाव बहिष्कार की स्थिति में इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

फिलहाल, ग्रामीणों के खुद सड़क निर्माण में जुटने के बाद सकंड गांव की सड़क की मांग एक बार फिर प्रशासन के सामने बड़ा सवाल बनकर खड़ी हो गई है।

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